गुप्त साम्राज्य का वर्णन और महान शासक

गुप्त वंश के शासन काल को भारतीय इतिहास का स्वर्णिम काल कहा जाता है गुप्त साम्राज्य का प्रारंभ 240 ईसवी में पहले शासक श्री गुप्त से हुआ.

गुप्त साम्राज्य का वर्णन और महान शासक

इस वंश के अंतिम शासक बुध गुप्त ने 495 ईसवी तक राज किया इस वंश के उत्तराधिकारी सातवीं सदी तक राज करते रहे परंतु पूर्णतया सीमित और शक्तिहीन रहे.

गुप्त वंश में चंद्रगुप्त प्रथम समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य एवं स्कंध गुप्त जैसे प्रतापी सम्राट हुए.

इसी वंश का शासक समुद्रगुप्त एक महान वीर हुआ जिसने अपनी तलवार से सारे गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया, इसका परिचय हमें प्रयाग प्रशस्ति के शिलालेख में मिलता है.

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य एक महान सम्राट था, इनके काल में भारत में विद्या शिक्षा संस्कृति विज्ञान कला एवं निर्माण कला में अभूतपूर्व प्रगति हुई.

धन धान्य से भरपूर यह देश सोने की चिड़िया कहा जाने लगा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में आए चीनी यात्री फाह्यान ने भारत की प्रशंसा करते हुए इसकी तत्कालीन राजधानी पाटलिपुत्र को दुनिया का श्रेष्ठतम नगर बताया था.

पांचवी सदी में मध्य एशिया के आए हुन आक्रमणकारी का गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त ने डटकर सामना किया, उन्हें अनेक बार हराया.

लेकिन बाद में निर्मल उतरा अधिकारियों के समय में हूण नेता तूरमान्य ने अधिकांश गुप्त साम्राज्य पर कब्जा कर लिया.

दूसरे हूण शसक कोलहुन के पश्चात तो हूण भी कमजोर हो गए. इसके बाद देश में पुनः अराजकता फैल गई.

दोस्त आइये अब गुप्त वंश के राजाओं के बारे में विस्तार से जानते हैं.

श्री गुप्त, गुप्त वंश के संस्थापक

श्री गुप्त घटोत्कच, जैसा हमने आपको बताया कि गुप्त साम्राज्य की नींव श्री गुप्त ने 240 ईसवी में रखी थी, श्री गुप्त ने 40 वर्ष तक शासन किया और उसके बाद उसका पुत्र घटोत्कच 280 ईसवी में गुप्त साम्राज्य के तट पर बैठा.

श्री गुप्त, गुप्त वंश के संस्थापक

प्राचीन लिखो में श्री गुप्त और उसके पुत्र घटोत्कच को महाराजा की उपाधि दी गई थी लेकिन चंद्रगुप्त प्रथम को राजाधिराज की उपाधि से नवाजा गया जिसका अर्थ था राजाओं का भी राजा.

चौथी सदी की शुरुआत में गुप्त वंश ने मगध के एक छोटे से हिंदू राज्य और वर्तमान बिहार से अपने शासन की शुरुआत की थी.

चंद्रगुप्त प्रथम

गुप्त सम्राट घटोत्कच ने अपने पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम को 319 ईसवी में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया.

चंद्रगुप्त ने एक संधि के कारण मगध के एक मुख्य शक्ति लिच्छवी की राजकुमारी देवी से विवाह किया.

चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का साशक

दहेज में मगध साम्राज्य पाकर और नेपाल के लिच्छवियों के साथ मिलकर चंद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य का विस्तार करना शुरू किया.

इस तरह उसने मगध, प्रयाग और साकेत के काफी हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया.

अब उसने अपना शासन 321 में गंगा नदी से लेकर प्रयाग तक बढ़ा दिया था.

उसे महाराजाधिराज की उपाधि दी गई थी और उसने अनेक विभागों से अपने साम्राज्य का विस्तार किया, और उसने अनेक विवाह संधियों से अपने साम्राज्य का विस्तार किया.

समुद्रगुप्त

335 ईसवी में अपने पिता चंद्रगुप्त प्रथम के राज को समुद्रगुप्त ने आगे बढ़ाया और अपनी मौत तक लगभग 45 वर्षों तक शासन किया.

उसने शुरुआत में ही आहिचात्र और पद्मावती साम्राज्य को अपने शासन में मिला लिया था.

समुद्रगुप्त

इसके बाद उसने सभी आदिवासी लाखों मालवा, योध्ये, अर्जुनायन, मधुरा और अभिरा पर आक्रमण कर दिया 380 में अपनी मौत से पहले समुद्रगुप्त ने 20 से भी ज्यादा गण राज्यों को अपने शासन में मिला लिया था.

अब उसका शासन हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक फैल गया था, विदेशी इतिहासकारों से भारतीय नेपोलियन मानते थे.

समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया था जिसमें वह पड़ोसी राज्यों में एक घोड़े के साथ सेना को युद्ध के लिए ललकारता था, अगर पड़ोसी राज्य उसके साथ मिलने को राजी नहीं होता तो उनको युद्ध करना पड़ता था.

समुद्रगुप्त ना केवल एक अच्छा योद्धा था बल्कि कला और साहित्य प्रेमी भी था उसने वर्तमान कश्मीर और अफगानिस्तान के इलाकों पर भी विजय प्राप्त की थी.

रामगुप्त

रामगुप्त के बारे में इतिहास में मतभेद है लेकिन ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि राम गुप्त समुद्रगुप्त का जेष्ठ पुत्र था.

रामगुप्त गुप्त वंश का शासक

जेष्ठ पुत्र होने के कारण है उसे गुप्त साम्राज्य का पदभार सौंपा गया शासन में योग्य ना होने के कारण उसे सिहासन से उतार दिया गया, और उसके बाद चंद्रगुप्त द्वितीय ने सत्ता संभाली.

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य

गुप्त लेखों के आधार पर अपने पुत्रों में से समुद्रगुप्त ने राजकुमार चंद्रगुप्त द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी बनाया था.

चंद्रगुप्त द्वितीय इतिहास में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य Gupt vansh ka Shasak

जिनकी माता का नाम दत्ता देवी था चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने 380 ईसवी में सत्ता संभाली थी उसमें कदम राजकुमारी कुंतला से विवाह किया था.

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए मालवा, गुजरात, बंगाल और सौराज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया.

उसने 395 ईसवी में अपने मुख्य शत्रु रुद्रसेना तृतीय को पराजित किया और बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया.

चंद्रगुप्त द्वितीय का साम्राज्य युद्ध से ज्यादा हिंदू संस्कृति कला और विज्ञान के विकास के लिए जाना जाता है.

गुप्त काल की कला की शानदार नमूने आपको देवगढ़ के दशावतार मंदिर में देखने को मिलते हैं.

अपने काल में चंद्रगुप्त ने बुद्ध धर्म और जैन धर्म का भी प्रचार किया जिसके कारण उसके शासनकाल में बुध काला का काफी विकास हुआ.

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल के बारे में विस्तृत जानकारी चीनी यात्री फाह्यान ने अपने लेखों में लिखे थे.

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चंद्रगुप्त के दरबार में नवरत्न दरबारी थे यह सभी दरबारी अपनी अपनी कलाओं में निपुण है इन सभी नवरात्रों में से कालिदास का नाम सबसे पहले लिया जाता है जिन्होंने अपने ग्रंथों पर अपनी कविताओं से पूरे भारत में प्रसिद्धि प्राप्त की.

कुमारगुप्त प्रथम

चंद्रगुप्त द्वितीय के बाद उसके पुत्र कुमारगुप्त प्रथम को उत्तराधिकारी बनाया गया.

कुमारगुप्त प्रथम की माता का नाम महादेवी ध्रुव स्वामिनी था, कुमारगुप्त को महेंद्रादित्य की उपाधि से सम्मानित किया गया था.

Kumar Gupt नालंदा में एक बुद्ध विश्वविद्यालय का निर्माण

कुमारगुप्त प्रथम ने 455 ईसवी तक राज किया था उसके शासन के अंत होने तक नर्मदा घाटी में पुष्यमित्र अपना साम्राज्य प्रसाद कर रहा था.

कुमारगुप्त ने वर्तमान बिहार के नालंदा में एक बुद्ध विश्वविद्यालय का निर्माण भी करवाया था.

स्कंदगुप्त

कुमारगुप्त प्रथम के पुत्र स्कंद गुप्त प्रथम को महान गुप्त साम्राज्य का अंतिम शासक माना जाता है उसको विक्रमादित्य, और कर्मादित्य की उपाधियों से नवाजा गया था.

स्कंदगुप्त महान गुप्त साम्राज्य का अंतिम शासक

उसने पुष्यमित्र को तो पराजित कर दिया, लेकिन बाद में उसका सामना श्वेत हुणों से हुआ श्वेत हुणों का स्कंदगुप्त ने डटकर सामना किया.

स्कंद गुप्त प्रथम ने श्वेत हूणों को एक हद तक रोके रखा था लेकिन हुणों के साथ युद्ध में उसका काफी धन और सेना बर्बाद हो गया.

467 ईसवी में स्कंद गुप्त की मृत्यु हो गई और उसके गोत्र भाई पूर्व गुप्त ने सत्ता संभाली.

गुप्त साम्राज्य का पतन

स्कंद गुप्त की मौत के पश्चात साफ तौर पर गुप्त साम्राज्य का अंत हो चुका था, इसके बाद कुछ वर्षों तक पूर्वगुप्त, बुद्धगुप्त, नरसिंहगुप्त, कुमारगुप्त तृतीय और विष्णु गुप्त ने शासन किया..

480 ईसवी में श्वेत हूणों ने गुप्त साम्राज्य की कमर तोड़ दी थी और 550 ईसवी में पूरी तरह से उत्तर पश्चिम के इलाकों पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद गुप्त साम्राज्य का हमेशा के लिए पतन हो गया.

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आपका कीमती समय निकलकर पूरा लेख पढने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ईश्वर करे आपका दिन शुभ हो.

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